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शनिवार, 11 जुलाई 2015

फिल्म समीक्षा - एक्शन, प्यार और बदले की कहानी 'बाहुबली'

2015 की मोस्ट अवेटेड फिल्मों में से एक एसएस राजामौली की फिल्म बाहुबली इस शुक्रवार को सिनेमा घरों में प्रदर्शित हो गयी. एसएस राजामौली ने इससे पहले ईगा और मगधीरा जैसी शानदार फिल्मों की सौगात दर्शकों को दे चुके हैं। बाहुबली उनकी हिंदी दर्शकों को एक सौगात ही कही जाएगी।  फिल्म के हिंदी वर्जन में चूंकि बतौर प्रोडूसर कारन जौहर भी शामिल हैं तो फिल्म देखने की उत्सुकता दर्शकों में पहले से ही थी। फिल्म को भारत की सबसे महंगी फिल्म कही जा रही है. फिल्म एक साथ 4000 से अधिक थियेटरों में रिलीज की गयी है। 
कहानी - फिल्म की कहानी एक साहसी युवक शिवुदू (प्रभास) की है। बचपन से ही वे अपने फैंटिसी वर्ल्ड में रहता है और जल पर्वत पर चढ़ने की इच्छा रखता है। कई बार वो उस पर्वत पर चढ़ना चाहता है लेकिन असफल हो जाता है।  उसकी माँ ये कतई नहीं चाहती कि वो उस पर पहाड़ी पर जाये।  शिवुदू बचपन में अपनों से बिछड़ जाता है और जंगल में रहने वाला एक दम्पति उसे पालता है. वह जंगल में अपनी जिंदगी बिताता है। एक दिन वे अपनी इच्छा को पूरा करता हुआ जल पर्वत पहुंच जाता है, जहां उसकी मुलाकात अवंतिका (तमन्ना भाटिया) से होती है। दोनों को प्यार हो जाता है, इसके बाद शिवुदू को अपने असली माता-पिता अमरेंद्र बाहुबली (प्रभास) और देवासना (अनुष्का शेट्टी) व उनके लाइफ के विलेन भल्लादेव (राणा दग्गुबाती) के बारे में पता चलता है।  जनता उसे बाहुबली नाम देती है और उसे भगवान मानने लगती है. कहानी आगे बढ़ती है। भल्लादेव कौन है और क्यों शिवुदू उसकी वजह से अपने असली माता-पिता से दूर हो जाता है, उसे वहां के लोग अपना भगवान क्यों मानते हैं ? पूरी कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है.
एक्टिंग- बात अगर एक्टिंग की की जाये तो सभी कलाकारों ने अपने रोल के साथ न्याय किया है। शिवुदू के रोल में प्रभास ने बाहुबली और शिवदू, दोनों रोल में बढ़िया अभिनय किया है. हाँ ये भी सत्य है की डायलॉग्स डिलेवरी के डबिंग में कहीं न कहीं खामी जरूर दिखी है। भल्लदेव के रोल में राणा दग्गुबाती ने न सिर्फ अपने कद-काठी का बेहतरीन प्रदर्शन किया है बल्कि अपने रोल को भी संजीदा से निभाया है। अवंतिका के रोल में तमन्ना भाटिया की ये फिल्म हिंदी दर्शकों के बीच जरूर उनकी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराएगी। देवसेना के छोटे रोल में अनुष्का शेट्टी ने अपने अनुभव का बढ़िया फायदा उठाया और अपने रोल को जीवंत कर दिया। 
म्यूजिक- जैसा की साउथ की फिल्मों का संगीत अक्सर कमजोर रहता है वो इस फिल्म में दिखा। गाने फिल्मों में खानापूर्ति मात्र के लिए हैं जिसे दर्शक सिनेमा हॉल से बाहर आने पर जरूर भूल जाएंगे। 
देखें की नहीं - अगर आप हॉलीवुड और साउथ की फिल्मों के शौक़ीन हैं तो बाहुबली आपका भरपूर मनोरंजन करेगी. फिल्म को सीजी इफ़ेक्ट ने और भी लाजवाब बना दिया है।  बाहुबली की सबसे ज्यादा चर्चा उसके कंप्यूटर तकनीक के चलते हुई। फिल्म में सींस को रियल दिखाने के लिए राजमौली ने सीजी इफेक्ट्स का बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल किया। फिल्म की एक्शन और कहानी दोनों आपको पसंद आएंगे। इस सप्ताह बाहुबली  मनोरंजन का फुल डोज साबित हो सकती है। 
निर्देशक-  एस.एस. राजमौली
कलाकार- प्रभास, राणा दग्गुबाती, तमन्ना भाटिया, अनुष्का शेट्टी, रमैया
प्रोड्यूसर- शोभू यरलागड्डा, प्रसाद देवनेनी और करन जौहर
म्यूजिक डायरेक्टर- एम. एम. कीरवानी

रेटिंग- 3 .5/5

शुक्रवार, 29 मई 2015

वेलकम टू कराची- कॉमेडी और एक्शन के भंवर में फंसी कहानी


इस वीकेंड पर अगर आप कोई कॉमेडी फिल्म देखने की सोच रहे हैं और कॉमेडी के नाम पर अगर आपके जेहन में वेलकम टू कराची का नाम आ रहा है तो प्लीज उसे अपने जेहन से निकाल दें। वेलकम टू कराची में आपको न तो कॉमेडी मिलेगी न ही एक्शन । जैकी भगनानी की पिछली फिल्मों की तरह ये फिल्म भी आपको निराश ही करेगी। हां अगर आप अरशद वारसी के लिए ये पिक्चर देखना चाहते हैं तो देख सकते हैं लेकिन फिल्म आपको निराश ही करेगी।

चित्र गूगल से
कहानी - फिल्म की कहानी शुरू  होती है गुजरात के जामनगर से । शमीम (अरशद वारसी) का नेवी से कोर्टमार्शल हो चुका है और वो केदार पटेल (जैकी भगनानी) के साथ मिलकर जैकी के पिता का बोट चलाता है। दोनों जिगरी यार हैं।  केदार अमरिका जाना चाहता है। इस काम में शमीम उसकी मदद करने की बात कहता है। बिना वीजा के वो लोग समुद्र के रास्ते अमरिका जाने का प्लान बनाते है। दोनों मिलकर एक दिन बोट लेकर निकल पड़ते हैं। समुद्र में आए तूफान के कारण इनकी बोट पाकिस्तान के कराची शहर के बीच पर पहुंच जाती है । इनके पहुंचने के कुछ देर बाद ही वहां बम ब्लॉस्ट होता। शमीम का पर्स बीच पर ही छूट जाता है जो आईएसआईएस की ऑफिसर लॉरेन गॉटलिब  के हाथ लग जाता है। जो इन दोनों को खोजने लगती है। पाकिस्तान से भागने के चक्कर में ये आतंकियों के हाथ लग जाते हैं। इनकी गलती से आंतकियों के कुछ ठिकाने नष्ट हो जाते हैं और वो वीडियो पाकिस्तानी मीडिया तक पहुंच जाता है। पाकिस्तानी सरकार आगामी चुनाव में फायदे के लिए इन दोनों को जबरन पाकिस्तानी बनाकर देश का हीरो बना देती है। आगे ये दोनों वहां से कैसे निकलते हैं ? इनके साथ क्या होता है ? इनका राज खुलता है कि नहीं ? कैसे इनको लेकर राजनीति की जाती है ? कहानी इसी पर आधारित है।  डायरेक्टर आशीष मोहन कहानी को बांधे नहीं रख पाते। पहले हाफ तक तो पूरी पिक्चर बोरिंग लगती है। पिक्चर शायद एक्शन थ्रिलर होती तो ज्यादा अच्छा होता।

ऐक्टिंग- बात अगर ऐक्टिंग की करें तो जैकी भगनानी ने जरुर अच्छा काम किया है। पूरी फिल्म में उन्होंने  कम समझ और अपने में मस्त रहने वाले किरदार को अच्छे से निभाया है
। हां कहीं-कहीं उनकी नामसझी ओवर एक्टिंग लगने लगती है। अरशद वारसी आशा के अनुरूप इस बार छाप छोड़ने में असफल साबित हुए हैं। कई बार उनके एक्सप्रेशन ने उनके डायलॉग का साथ नहीं दिया। कई बार उनसे ओवर एक्टिंग भी करवाई गई।लॉरेन गॉटलिब को फिल्म क्यों रखा गया है ये बात समझ के परे है। फिल्म बिना हिरोइन के भी बन सकती थी जब उनसे कुछ करवाना ही नहीं था। अयूब खोसो, इमरान हसनी छोटे रोल में भी जमे हैं। पाकिस्तानी एक्ट्रेस कुबरा खान को भी फिल्म में देखा जा सकता है।  लेकिन एक्टिंग  के लिए नहीं।   

डायलॉग्स- कुछ खास नहीं है। एकाध को छोड़कर। बॉर्डर हमेशा छोटे होते हैं दूरियां ज्यादा होती हैं, बॉर्डर पर तार नहीं है, चोर तो दोनों ओर रहते हैं। ये कुछ डायलॉग्स है जो नोटिस किए जा सकते हैं।

म्यूजिक- दारू की लोरी को पहले ही काफी एन्टेशन मिल चुका है। संगीतकार रोचक कोहली और और जीत गांगुली का काम फिल्म को देखते हुए अच्छा है।  इसके अलावा शकीरा गाने पर आइटम सॉन्ग भी ठीक है।

देखें की नहीं- अगर आपके पास अतिरिक्त समय और रुपए हों तो एक बार फिल्म देखी जा सकती है, अन्यथा नहीं।

रेटिंग- 2/5